चाणक्य नीति-दूसरों का आसरा लेने वाले जल्दी तबाह हो जाते हैं

निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्।
खग चीतफल वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागता गृहम्।।

हिंदी में भावार्थ-निर्धन पुरुष को वैश्या, पराजित और शक्तिहीन राजा को प्रजा, फलहीन वृक्ष को पक्षी जिस तरह त्याग देते हैं उसी तरह भोजन करने के बाद अतिथि को गृहस्थ का त्याग कर देना चाहिये।

नदी तीरे च ये वृक्षाः परगृहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनश्चय राजानः शीघ्रं नश्चाननसंशयम्

हिंदी में भावार्थ-नदी के किनारे वृक्ष, दूसरे के घर रहने वाली स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन के लक्ष्य और कार्य पर स्वयं ही निर्भर रहना चाहिये। यह सही है कि अपने अनेक कार्यों के लिये दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है पर उस समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि अपनी निर्भरता किसी एक व्यक्ति की बजाय अनेक पर हो ताकि एक अगर सहायता न तो दूसरा कर दे। अपने कार्य तथा उद्देश्य की पूर्ति के सदैव स्वयं ही विचार करते हुए सक्रिय रहना चाहिये। दूसरों निर्भर रहने से जीवन में असफलता की आशंका बलवती होती है।
परिवार समाज और राष्ट्र के मुखिया को सदैव अपनी शक्ति और अर्थ का संचय करते रहना चाहिये। जहां उसकी शक्ति में शिथिलता आने के साथ ही धनाभाव घेर लेता है वहां उसके अंतर्गत सक्रिय अन्य लोग ही नहीं वरन् स्वजन ही उसका त्याग कर देते हैं। अपनी शक्ति और संपन्नता बनाये रखने के लिये अपने गुणों और दुर्गुणों पर निरंतर दृष्टिपात करते हुए आत्म मंथन करते हुए नये प्रयोग करते रहने से शक्ति अर्जित होती है और साथ में अपने प्रति लोगों में नवीनता का भाव बनाये रखा जा सकता है। वैसे आयु अनुसार शक्ति और समयानुसार धन का हृास होता है पर गुणवान और ज्ञानी लोग अपने अभ्यास से इसका आभास किसी को नहीं होने देते जिससे उनकी शक्ति यथावत रहती है।
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4 Responses to this post.

  1. Posted by RAJ SINH on May 24, 2009 at 1:40 am

    आपकी मीमान्षा को सलाम !

    लिखा ’हमरे’ चाणक्य ने पर सब से बढिया प्रैकटिस …………देश अहित की भी शर्त पर स्वहित मे ’हमरे’ नेता , फ़िर इसी क्रम से चीन , पाकिस्तान , अमेरिका आदि बहुत सारे हैं .
    ’हम’ मूर्ख वैश्यावों,…………………वगैरह की तरह ’बुधिजीवी’ ! हैं ही इनके लिये !!
    :) :)

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  2. Posted by RAJ SINH on May 24, 2009 at 1:44 am

    भारतीय नेताओं के सन्दर्भ मे उस ’उपभोग ’ की लिस्ट मे भारत के वोटरों का नाम भी जोड दें आप . चाणक्य होते तो करते .

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  3. Posted by RAJ SINH on May 24, 2009 at 1:57 am

    मीमान्शः वोट का आतिथ्य पा नेता को भी वोटरों का वैसे ही त्याग कर देना चाहिये जैसे…………..

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  4. Posted by vijayshukla on May 29, 2009 at 5:37 am

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