संत कबीर वाणीःहमारे घट में है ज्ञान का भंडार
(यह इस ब्लाग/पत्रिका की सौवीं पोस्ट है)
सहकामी तू घट में करै, घट ही में करतार
घट ही भीतर पाइये, सुरति शब्द भण्डार
संत शिरोमणि कबीर दास हृदय को जो धारण किये है वही सबका करतार है। इसी हृदय के भीतर ज्ञान और सत्य का अपार भंडार है अगर हम उसे पा लें तो जीवन सफल हो जायेगा।
सहकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम
निहकामी सुमिरन करै, पावै अविचल राम
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो कामना रखकर परमात्मा का भजन करते हैं उनको उत्तम फल की प्राप्ति होती है परंतु जो निष्काम भाव से भगवान श्रीराम का स्मरण करते है उन्हें अविनाशी परमात्मा के अवश्य दर्शन होते हैं।
संपादकीय व्याख्या-संत कबीरदास जी ने यहां सकाम भक्ति का भी फल बताया है पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि बिना हृदय में धारण किये उसमें भी सफलता मिल जायेगी। वह अपने दोहों के निरंतर इस बात पर जोर देते हैं कि हृदय में ही परमात्मा का ढूंढो तभी ज्ञान और सत्य के भंडार की प्राप्ति होगी। आजकल हम देखते हैं कि सकाम भक्ति के नाम पर भी ढोंग का बोलबाला है। लोग तमाम तरह की मूर्तियों की पूजा करने को अलावा कथित ढोंगी संतों को अपना गुरू बनाते है। कबीर दास यह भी कहते हैं कि जो केवल रटकर ज्ञान सुनाते हैं उनको अपना गुरू बनाने से कोई भी लाभ नहीं होता। वह उन्हें सकाम भक्ति का वह रास्ता बताते हैं जिसमें परमात्मा की जगह गुरू की मूर्ति घरों में रखवाकर उसकी पूजा करवाते हैं। तमाम तरह की दक्षिण और दान मांगते हैं। सांसरिक पदार्थ इस तरह भेजते हैं जैसे उनका नाम लिख जाने से वह पवित्र हो गये हों। यह कथित सकाम भक्ति भी किसी काम की नहीं है। उसके लिये भी यह आवश्यक है कि भगवान को हृदय में धारण किया जाये।
नोट-यह इस ब्लाग/पत्रिका की सौवी पोस्ट है और इसके लिये ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई क्योंकि उनकी प्रेरणा से ही यह कार्य संभव हो सका<
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
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दीपक जी सौंवी पोस्ट की बधाई।
और आप इसी तरह लोगों का ज्ञान बढाते रहे यही शुभकामना है।
१०० वीं पोस्ट की बधाई. जारी रहें. शुभकामनायें.