चाणक्य नीतिःतपस्या से असंभव भी हो जाता हैं संभव
जीवनां मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्
मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवन न संशयः
धर्म रहित प्राणी जीवित होते हुए भी मृतक के समान होता है जबकि धर्मात्मा व्यक्ति देह त्यागने के बाद भी जीवित रहता है। इस बारे में संशय नहीं करना चाहिए।
यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्व दूरे व्यवस्थितम्
तत्सर्व तपसां साध्यं तपो हि दूरतिक्रमम्
इस विश्व में कोई अगर ऐसी वस्तु या पदार्थ जो अपने से बहुत दूर दिखाई देता है और ऐसा लगता है कि कोई मनुष्य उसे प्राप्त नहीं कर सकता तो भी उसे तपस्या से प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि उसकी शक्ति असीम है।
संपादकीय व्याख्या-यह विश्व कर्म प्रधान है और कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नहीं रह सकता। जब विचार किया जाता है तो कई ऐसे लक्ष्य होते हैं जो असंभव लगते हैं पर अगर उनके लिये निष्ठापूर्वक परिश्रम किया जाये तो उसे पाना कोई असंभव काम नहीं है। पहले जिन ऋषियों और मुनियों ने ज्ञान और भगवान की प्राप्ति के लिये तपस्या की तो अपना लक्ष्य पाया। ऐसे लोगों ने अन्न,जल और अन्य सुविधाओं का त्याग कर तपस्या की। आज के संदर्भ में ऐसी किसी तपस्या नहीं की जाती क्योंकि उनके परिश्रम से इतना ज्ञान तो समाज को प्रंाप्त हो गया है कि उसे इस संसार के रहस्यों का आभास हो गया है। तपस्या का मतलब केवल आंखें मूंदकर एक जगह बैठने से नहीं वरन् कठोर श्रम से है। कई बार जीवन में ऐसे अनुभव होते हैं कि अमुक वस्तु प्राप्त करन हमारे लिये कठिन है तब भी उसके लिये सद्भावना और निष्ठा से कर्म करते रहना चाहिए तो उसकी प्राप्ति अवश्य होगी।
Filed under: Blogroll, Hindi Darshan, Hindi friends, Hindi kahane, Hindi knowledge, Hindi news, Hindi writing, Hindu culture, Hindu darshan, bharat, chanakya, chankya, hindi Personal, hindi abhivyakti, hindi adhyatm, hindi anubhuti, hindi arthshastra, hindi astha, hindi bharat, hindi blogging, hindi gyan, hindi india, hindi internet, hindi mitra, hindi sanskar, hindi shabd, hindi thinking, hindu dharm, web bhasakar, web dunia, web duniya, web jagaran, अनुभूति, मस्तराम, हिंदी पत्रिका