मनुस्मुतिःस्त्रियों का सम्मान न हो तो शुभकर्मों का फल भी नहीं मिलता
पिर्तभिभ्रौतृभिश्चैता पतिभिदैवरैस्तथा
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः
विवाह के समय अपने कल्याण पिता, भाई, पति और देवर कन्या को वस्त्र और आभूषण से संसज्जित कर सकते हैं। कन्य इस तरह सुसज्जित करना पूजा करना कहलाता है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रेतास्तु न पूज्यन्त सर्वास्तात्राफलसः क्रियाः
जहां नारियों का आदर सम्मान होता है वहां देवता भ्रमण करते है और जहां उनका इसके विपरीत होता वहां शुभ प्रकार के कर्मों का भी कोई फल नहीं होता
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वर्तमान समाज में दहेज एक विकट समस्या है और देखा जाये तो मनु जी के अनुसार उसका एक तरह से विरोध ही किया गया है। उनका कहना है कि विवाह के समय कन्या को पति और भाई के साथ पति और देवर भी वस्त्र और आभूषण दे सकते हैं। एक श्लोक में उन्होंने कन्या के पिता द्वारा अपनी कन्या के लिये वर पक्ष से धन लेना वर्जित बताया है पर यह कहीं नहीं कहा कि कन्या को वह दहेज दें। हालांकि आजकल ससुराल वाले कन्या के लिये गहने और वस्त्र तो करते हैं पर पहले उसके लिये कन्या पक्ष वालों से भारी राशि वसूल करते हैं। यह अनुचित और मनु द्वारा स्थापित पंरपराओं के विपरीत है।
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि जातिवाद को आधार मानकर मनु स्मृति को समाज से विस्मृत करने का प्रयास इसीलिये किया गया है ताकि कर्मकांडों को समाज पर लादकर उसे बैल की तरह उसे ढोते रहने को बाध्य किया जाये। मनु जी का कहना है कि स्त्रियों का जहां सम्मान नहीं होता वहां शुभकर्मों का भी फल नहीं मिलता। जबकि अनेक धर्मकर्म करने वाले अपनी स्त्रियों को दासी की तरह समझते हैं। एक बात तय है कि मनु स्त्री और पुरुष का जीवन के एक सिक्के की तरह मानते हैं इसलिये वह स्त्री के सम्मान की बात करते हैं। मनु के समय में भी मनुष्य समाज पुरुष प्रधान समाज था और आज भी है और भले ही स्त्रियां आजकल नौकरी और व्यापार में काम कर रहीं है पर वह भी अपने पति और बच्चों को उतना ही प्यार करतीं हैं जितना मनु के समय में करतीं रहीं होंगी। इस प्यार के कारण वह पति का सहयोग नहीं मिलने पर भी परिवार के कार्यों का समूचा बोझ अपने सिर पर ले लेतीं हैं। इसके बावजूद कई परिवारों में उनको सम्मान नहीं मिलता। जहां स्त्रियां कामकाजी नहीं है तो वहां तो उन्हें और भी परेशान होना पड़ता है। स्त्रियां बहुत सहनशील होतीं हैं और अपने घर की इज्जत को ढंकने के लिये बाहर अपनी घर-परिवार की व्यथाएं नहीं कहतीं पर मनु महाराज के अनुसार पुरुषों को यह समझना चाहिए कि उनके मन से उठी आह उनके शुभकर्मों-यज्ञ, हवन और मंत्रोच्चार से मिलने वाले लाभों से वंचित कर सकतीं है।
Filed under: Blogroll, Deepak bharatdeep, Hindi Darshan, Hindi Education, Hindi friends, Hindi kahane, Hindi online journalism, Hindi vews, Hindi writing, Hindu darshan, hindi Personal, hindi adhyatm, hindi blogging, hindi gyan, hindi megzine, hindi samachar, hindi shabd, hindi vichar, hindu dharm, manu smruti, web bhasakar, web dunia, web duniya, web jagaran, web nai duniya, अभिव्यक्ति, आध्यात्म, आलेख, कला, परिवार, मस्तराम, समाज, हिंदी पत्रिका
वांछित स्थिति का उल्लेख या अनुरोध तभी किया जाता है जब वह वास्तव मे न हो ।जैसे -हम दो हमारे दो ,नारा इस लिए बना क्योंकि ऐसा नही था । इसके मायने स्त्री का अपमान मनु काल से चला आ रहा है तभी उन्हे सम्मान की गुहार लगानी पड़ी और यह लिखना पड़ा !
यहां बहुत सारी विवादास्पद बातें भी लिखी है. भाई.