शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना
संविभागश्च भूतेभ्यःकर्तव्योऽनुपरोधतः
सदाचार गृहस्थ को अपनी सामथ्र्यानुसार ब्रह्मचारी और सन्यासी को भिक्षा देनी चाहिए तथा बिना किसी भेदभाव से अतिथि बनकर आये सभी जीवों को उनके भाग का भोजन और पानी देना चाहिए।
पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकाञ्छठान्
हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्
जो व्यक्ति पाखंडी, दुष्ट कर्म करने वाला दूसरो को मूर्ख बनाकर पैसे एंठने वाला वेदों में श्रद्धा रहित पर ऊपर से सहृदय दिखने वाला है उसको गृहस्थ कभी भी अपना अतिथि नहीं बनाये।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- हमारे अध्यात्मिक दर्शन में दान और अतिथि सत्कार की बड़ी महिमा है पर उसके लिये मनु ने कई बंधन रखे हैं। अक्सर लोग मनु स्मृति पर जातिवाद फैलाने का आरोप लगाते है पर वास्तविकता यह है कि तत्कालीन समय में बने हुए समाजों के दृष्टिगत ही उनका उल्लेख उन्होंने किया है और अगर थोड़ा गौर से देखें तो स्पष्टतः भेदभाव को अधिक प्रधानता नहीं दी बल्कि चरित्र को दी है।
वह स्पष्टतः कहते हैं कि दान हमेशा सुपात्र को दें और आपके घर जो अतिथि आता है उसका बिना किसी भेदभाव के स्वागत करें। जिन लोगों का आतिथ्य सत्कार वर्जित किया है उनमें किसी भी जाति का आदमी हो सकता है और जिनके सत्कार की बात कही है उसमें भी कोई बंधन नही लगाया।
एक सहृदय सज्जन ने मेरे से पूछा था कि आपको नहीं लगता कि दान के कुपात्र के नाम पर लोग समाज में वैमनस्य फैलाते हैं तो मेरा उत्तर यह है कि इसमें मनु का क्या दोष?
आजकल दान के नाम पर कथित संत अपना घर भर रहे है तो इसमें मनु के संदेश नहीं बल्कि लोगो का अज्ञान जिम्मदार है। मैं तो कहता हूं कि लोगों को अपने दान के लिये सुपात्र ढूंढने की आवश्यकता ही नहीं है।
अरे हमारे आसपास अनेक गरीब मजदूरों के बच्चे रहते हैं, चुपचाप जाकर उनको कपड़े, किताबें दे आओ। बीमार पड़ने पर उनका इलाज कराओ।
हमारे घरों और व्यापारिक संस्थानों में अनेक युवक-युवतियां काम करते हैं। उनकी ऐसे ही पगार बढ़ा दो। उनको बोनस दे दो। यह क्यों उनसे कहते हो कि हम दान दे रहे हैं। यह तो अपने मन में रखना चाहिए। हमने अनेक विचाराधाराओं के नाम पर वाद और नारे लगाकर समाज को भ्रमित किया है जो वैसे ही अपने ज्ञान से दूर रहता आया है। हमारे मनीषी इस समाज की वास्तविकताओं से परिचित थे इसीलिये लोगों को दान करने के लिये उकसाते थे। यह कहना गलत है कि वह किसी जाति विशेष को दान करने के लिये कहते थे। ब्राह्मणों को कर्मकांड करने के बाद दान-दक्षिणा देने का प्रावधान किया गया है पर यह तो उनके लिए एक तरह से मेहनताना हुआ।
स्पष्टतः दान का आशय यही है कि आपके आसपास जो उसके पाने के पात्र है उसे ही दिया जाना चाहिए और आतिथ्य सत्कार में भी कोई भेद नहंी करना चाहिए।
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यह सुपात्र वाली बात आपने बहुत अच्छी बतलाई -अक्सर यह प्रश्न दिमाग में उठता है और कई लोगों के मुहं से सुना की हम सुपात्र कहाँ से लायें या सुपात्र की पहिचान कैसे करें -क्योंकि वहा दान का मतलब ही है की जो घर मांगने आया या किसी कथा में पैसा चडाया अथवा चरणस्पर्श कर भेंट दी -आपने बिल्कुल सही खुलासा किया है की कहीं सुपात्र को खोजने की जरूरत ही नहीं है धन्यवाद
पुनश्च
मैंने आज एक लेख दिया है “कहाँ खो गया ” क्रपया पढें शायद पसंद आए