मनुस्मृतिःपरिवार के लिये धन पूरा हो तभी सोमयज्ञ करें
यस्यं त्रैवाषिक्र भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये
अधिकं वापि विद्येत सः सोम पातुमर्हति
जिस व्यक्ति के पास अपने परिवार हेतु तीन वर्षों से भी अधिक समय तक के लिये भरण-भोषण करने के लिऐ पैसा न हो उसे सोमयज्ञ करने का अधिकार नहीं है।
अतः स्वल्पीयसि द्रव्यै यः सोमं पिवति द्विज
सः पीतसोपूर्वीऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम्
जो व्यक्ति निश्चित मात्रा में भी कम धन राशि होने पर सोमयज्ञ करता है उसका पहला किया हुआ सोमयज्ञ भी व्यर्थ चला जाता है।
वर्तमान संदर्भों में व्याख्या-हमारे अध्यात्म मनीषियों ने अगर यज्ञ, हवन और दान की महिमा को प्रतिपादित किया है पर उनका उद्देश्य समाज में सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण की रक्षा तथा गरीब और अमीर के बीच संतुलन स्थापित करना रहा है। अगर हम मनु के दर्शन को देखें तो वह पहले अपने परिवार के भरण भोषण को प्रमुखता देते हैं। अगर कोई व्यक्ति अधिक धन होने पर यज्ञ, हवन और दान करता हैं तो अच्छी बात है पर यह जरूरी नहीं है कि जिसके पास पर्याप्त धन नहीं है उसे कोई वैसा पुण्य नहीं मिलेगा। यज्ञों और हवनों में लोग एकत्रित होते हैं और उससे कुछ लोगों को आर्थिक लाभ होता है इसलिये जिनके पास धन है उनसे ऐसा करने के लिये कहा गया है पर जिनके पास नहीं है वह ऐसे समागमों में अपनी उपस्थिति से भी पुण्य प्राप्त कर लेते हैं। आशय यह है कि अपने और अपने परिवार को कष्ट देकर ऐसे धार्मिक कार्यक्रम करने का कोई लाभ नहीं है।
आपने देखा होगा की कुछ लोगों पर अपने परिवार के भरण-भोषण का जिम्मा होता है वहां उनके घर में कोई बुजुर्ग होते हैं वह अपने मन की शांति के लिये ऐसे यज्ञ हवन कराने या तीर्थ पर जाने के लिये उनसे धन मांगते हैं और नहीं मिलता तो धर्म का हवाला देते है। हम ऐसे कई परिवार देख सकते हैं जहां लोग यह अपेक्षा करते हैं कि पुत्र अपने माता-पिता को श्रवण कुमार की तरह तीर्थ पर ले जाये पर उसको अपने परिवार के भरण भोषण का ही इतना तनाव होता है कि वह न तो खुद ले जाता है और न ही जाने के लिए पैसा दे पाता है ऐसे में वह लोग अपने समाज में इसकी चर्चा करते हैं और लोग भी उसे कोसते हैं-और ऐसा करने वह लोग होते है जिनके पास पैसा होता है या फिर उन पर जिम्मेदारियां अधिक होतीं है। मनु के इन कथनों से एक बात यह स्पष्ट है कि पहला और बड़ा यज्ञ तो अपने आश्रितों को पेट भरने से है और बाकी धर्मकर्म के काम धन होने पर ही किये जाने चाहिए। यह भी एक जरूरी बात है कि अगर धन हो तो ऐसे काम करना चाहिए। यह प्रकृति द्वारा दिया गया संदेश मानिए कि अगर अधिक धन आया तो समाज हित में यज्ञ, हवन और दान करना चाहिए।
एक सहृदय सज्जन ने कहा था कि सुपात्र को दान देने के बहाने लोग नफरत फैलाते है और दूसरे धर्मों के खिलाफ भड़काते हैं। जिनका यह काम करने है वह तो करेंगे ही-एसा मेरा मानना है। एक बात मुझे इस संदर्भ में कहना है कि अगर हम दान करना चाहते हैं और हमें लग रहा है कि कोई सुपात्र व्यक्ति सामने हैं तो उसे देना चाहिए। मनु जी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी कि उसे भेदात्मक दृष्टि से देखना चाहिए।
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दीपक जी बिल्कुल सत्य कहना है आपका ये लेख मैंने अत्यन्त ध्यान से पढा - अध्यात्म क्या है कहाँ लोग जानते है मन्दिर पर नारियल चढाना और मन की इच्छाएं पूरी करने के लिए प्राथना करना कुछ लोगों के लिए यही आध्यात्म है इसे ओशो व्यापार कहते थे एक बार तो उन्होंने यह भी कहा था की केवल दुखी आदमी मन्दिर जाता है क्योंकि वे जानते थे की वहाँ निष्काम भाव से जाकर ध्यान लगाकर ==आपकी तरह ==कोई नहीं बैठता गीता के वाबत आपके विचार बिल्कुल साफ है उन्होंने मन्दिर पूजा -सफलता या धन की याचना प्रभु से करने जैसी कोई बात नहीं कही है =आजकल तो हर जगह व्यापार है =आपकी रुची देख कर निवेदन है की कभी सोलह सोमबार ब्रत कथा या शुक्र बार ब्रत कथा या ग्यारस की कथा पढ़ कर देखना क्या है ये और इनके उपासक अध्यात्मिक है -जहाँ तक आप हमेशा प्राचीन ग्रंथों की तारीफ करते है तो मैं कहूँगा की आप कभी गरुड़ पुरान पढ़ना शिव अंक =देवी अंक -अग्निपुराण तक में कभी कभी ऐसी बातें मिल जाती है जैसी आजकल आश्चर्यजनक बातें जाने कहाँ कहाँ से चेनल वाले लाकर बतलाते है गीता के वाबत तो ओशो भी तारीफ करते नहीं थकते थे -वैसे रामसुख दास जी महाराज ने गीता तत्व विवेच्नी में श्लोकों को बहुत किलियर किया है फिर भी आप अपना प्रयास जारी रखिये और जैसे एक जगह आपने बताया था की रहीम आज भी प्रासंगिक है उसी प्रकार विस्तार से एक एक श्लोक आज भी प्रासंगिक है ऐसी टिप्पणियाँ उदाहरण सहित प्रस्तुत कीजिये
एक ऐसी सरल तरकीब बताइये की आपकी साईड खोलते ही आपका उसी दिन का लेख उसी दिन मिल जाया करे ज़्यादा तलाश करना न पडे तथा आपके बिभिन्न ब्लॉग में न तलाशना पडे
पुनश्च
गीता के वाबत साई बाबा सहित जहाँ आपने आर्टिकल लिखा है वहाँ कमेन्ट देना चाहा मगर यूजर नेम व पास वर्ड मांगने लगा बहुत प्रयास के बाद असफल होकर यहाँ लिख रहा हूँ यह सोम यज्ञ के वाब्त नहीं है
श्री वास्तव जी
आपके विचार बहुत उत्कृष्ट और जानकारी वद्र्धक हैं। मैं आपके सामने यह स्पष्ट कर दूं जीवन बहुत सरलता और सहजता से जिया जा सकता है। केवल दो काम करने हैं एक तो योगसाधना करना और श्रीगीता पढ़ना। हां, मैं कभी कभी बाल्मिीकि रामायण की बात करता हूं पर वह कथा की दृष्टि से बहुत अच्छी है और उसमें बहुत सारा सांसरिक ज्ञान है पर श्रीगीता में सभी वेदों और पुराणों में से सार लेकर प्रस्तुत कर दिया गया है-एक तरह से कहा जाये तो श्रीकृष्ण जी ने संपादन कर दिया जो अच्छा था छांट लिया और जो नहीं था उसे खारिज कर दिया। आपने ओशो की बात की तो मैं बता दूं श्रीगीता को पढ़कर उसका ज्ञान धारण करने वाला व्यक्ति ही उस जगह पहुंच सकता है। आपके विचारों से मुझे भी कुछ पढ़ने को मिल जाता है और कभी अगर आप उन्हें मेरे ब्लाग पर देखें तो आश्चर्य न करें। मैं तो इसी तरह चलता हूं। मुझे पता नहीं कितना ज्ञान है पर श्रीगीता पढ़ने के बाद अब मुझे कोई और पुस्तक अगर सुहाती है तो वह आप देख रहें हैं मैं उनमें से छांटछांटकर लिखता हूं। आप हास्य कविताएं और व्यंग्य देखें तो वास्तव में मैं हंसता हूं और कुछ लोग कहते हैं कि तुम आध्यात्म पर लिखो तो मैं कहता हूं कि जो चिंतन करता हूं वही मुझे हास्य लिखने के लिये प्रेरित करता हैं और मैं कभी ढोंग कर जीना पसंद नहीं करता।
दीपक भारतदीप