मनुस्मृति: मांस खाने से कभी स्वर्ग नहीं मिलता
यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन
ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है
नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्
न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत्
किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है पर एक बात यह भी कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों का मांस भक्षण त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि हमारे देश में भी बलि के द्वारा पूजा की प्रवृति रही है। उपरोक्त श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यह सब दिखावा है। आपने देखा होगा कि कई लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर कई जगह पशुओं की बलि देकर अपने इष्ट को प्रसन्न करते हैं। कई जगह ऐसी मन्नतें भी मांगी जाती है जिसमें उसके पूर्ण होने पर पशुओं की बलि देने की बात कहीं जाती है। यह सब ढोंग है जो कि मांसाहारी लोगों ने अपने फायदे के लिये शुरू किया था। जो लोग ऐसा करते हैं वह पाखंडी हैं और उनको कभी भी पुण्य प्राप्त नहीं हो सकता है।
इसके विपरीत मांस से मानसिक और शारीरिक विकास उत्पन्न होते हैं जो जीवन को नरक बना देते हैं। इसलिये जिन लोगों को ऐसे भ्रम हैं कि बलि देने से उनके इष्ट प्रसन्न होते हैं उन्हें दूर कर लेना चाहिए।
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अच्छा! दारू पीने से मिल जाता है न?
दारू वाले तो जीते जी स्वर्ग में जीते हैं इसलिये कहीं बलि वगैरह देने के चक्कर में नहीं पड़ते न मरने के बाद उनके मन में स्वर्ग की इच्छा होती है। मैं जब पीता था उसके आधार यही विचार बना।
दीपक भारतदीप