मनुस्मृतिःविषयी लोग कभी सिद्ध नहीं होते
इंद्रिवाणां प्रसङगेन दोषमृच्छ्रत्यसंशयम्
सन्न्यिम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं निगच्छति
इस विश्व में सभी प्रकार के जीव इंद्रियों के विषयों में बुरी तरह फंस जाते हैं इसलिये उनमे एक नहीं अनेक दोष आ जाते हैं। जो व्यक्ति इंद्रियों पर नियंत्रण करते हैं वही सिद्धि प्राप्त कर पाते है।
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्तवा घ्रात्वा च यो नरः
न हृष्यति ग्लायनि वा स विज्ञेयो जितन्द्रियः
जो व्यक्ति अपने जीवन में अपनी निंदा-प्रशंसा, प्रिय-अप्रिय वचन सुनने, सुंदर और भद्दा दिखने, छूने में सख्त और कोमल, खाने में मीठे या कड़वे स्वाद, अच्छी या बुरी गंध को सूंघने तथा जो सुख और दुख से परे हो जाता है है वही सच्चा सिद्ध है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल हमारे सामने कई सिद्ध लोग आते हैं जो अपने पास अनेक प्रकार की चमत्कारी सिद्धि होने का दावा करते है। उनके कई मानने वाले भी भ्रमवश उनका प्रचार करते है। सच तो यह है कि आजकल सच्चा सिद्ध मिलना मुश्किल है। सच्चा सिद्ध तो वही है जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करता है। आजकल के सिद्ध तो काले पैसे को सफेद करने और अन्य चमत्कार करने में जुटे रहते हैं। सच्चे सिद्ध का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह किसी प्रपंच में नही फंसते। वह स्वयं किसी के पास जाते ह और न किसी को अपने यहंा आने के लिये प्रेरित करते हैं।
सिद्ध होने के लिये कोई सांसरिक कार्य छोड़ने की जरूरत नहीं होती। जिसे सब त्याग कहते हैं वह वास्तव में भाव का त्याग है। हमारे पास अनेक वस्तुऐं हैं उनका उपयोग तो हमें करना चाहिए पर उसके प्रति स्वामित्व का बोध नहीं रखना चाहिए। हम कोई कार्य करते हैं तो उससे हमें जिस धन की प्राप्ति होती है उसे फल नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि हम उस धन से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। वह धन लेना तो हमारे कर्तव्य का ही हिस्सा है न कि फल है। फल का आशय है मन की शांति और अगर वह नहीं है तो इसका मतलब यह कि हम अपने मन के प्रति कर्तव्यविमुख हो रहे हैं। उसको प्रसन्नता तभी मिलती है जब इद्रियों को वश में रखकर ईश्वर की आराधना करते हैं। धन हो या अन्य भौतिक साधन हमारे लिये फल नहीं हो सकते बल्कि वह हमारे कर्तव्य पूर्ति का हिस्सा होते हैं। जो यही विचार करते हैं उनको इस संसार के प्रति निष्काम भाव प्राप्त हो जाता है और वह जीवन का आनंद उठा पाते हैं।
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