होली के रंग फीके, मन है बेरंग-पर्यावरण पर चिंतन

पिछले वर्ष होली का लिखा चिंतन कल मैंने अपने एक ब्लोग पर छापा तो आज कोई दूसरा चिंतन लिखने का मन ही नहीं हुआ। वैसे देखा जाये तो कल ही कई ब्लोगरों ने होली मनाकर अपने सारे रंग खर्च कर दिए और आज लग रहा है सब खाली हो गए हैं। इसलिए सब पोस्टों पर कोई व्यंग्य की धार नजर नहीं आ रही है। मैंने भी कल हास्य कवितायेँ तो लिख दीं पर आज मन नहीं कर रहा है। आज मैं अकेले में बैठकर चितन करता हूँ वह हो नहीं रहा और जो हास्य है उसके लिए मन नहीं है।

अनेक लोगों में मुझे अपने ब्लोग पर होली की बधाई दी है पर मेरे संस्कारों में अलग-अलग पर्वों पर लोगों से खुशी से मिलने की आदत तो है पर मुहँ से या लिखकर देने की नहीं है। हाँ दीपावली मेरा मन पसंदीदा त्यौहार है और उस पर कई दिन पहले ही मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता है जबकि होली आते आने वाली परेशानियों का सामना करने की सोचता हूँ। इसकी वजह यह हो सकती है कि दीपावली पर सूर्य नारायण दक्षिणायन होते हैं और इस धरती पर शीतलता की वृद्धि होती है जबकि होली के बाद सूर्य उत्तरायण होते हैं और ग्रीष्म ऋतू बढ़ने वाली होती है। बिगड़ते हुए पर्यावरण, महंगाई, सामाजिक तनावों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों ने लोगों के मन में सभी पर्वों के प्रति उत्साह कम कर दिया है। आज से डेढ़ वर्ष पूर्व दीपावली पर चिकन गुनिया जैसी बिमारियों का प्रकोप इतना था कि उससे त्रस्त लोग दीपावली भी नहीं मना सके थे। शहर के जिस घर में जाता लोग बीमार मिलते-सच तो यह है कि उस समय शहर में किसी के घर जाना नरक जैसा लगता था। हम शहर के बाहर रहते हैं इसलिए उसका प्रकोप न के बराबर था। उससे मुझे यह बात समझ में आयी कि आक्सीजन की उपलब्धता घनी बस्तियों में कम होने के कारण भी कई बीमारियाँ फैलतीं हैं।

इस बार होली से पहले ही मौसम ने कई लोगों को बीमार कर दिया। दिन में मई जैसी लू की अनुभूति होने और शाम को ठंड होने से लोगों के लिए बहुत सारी परेशानी हुई। पानी की दिक्कत जब सर्दियों में दिखाई देती हो तो गर्मी में क्या होगा? शहरों में जनजीवन का हाल यह है कि थोडा से दिनचर्या में बदला पूरे दिन को बर्बाद कर देता है। मैं अपनी बोरिंग को लेकर संशय में हूँ और गर्मी में वह कितना साथ देगी यह सोचकर चिंतित हो रहा हूँ। फिर कल अखबार में छपा था कि इस वर्ष की गर्मी पिछले कई रिकार्ड तो देगी। पर्यावरण से आदमी बेखटके खिलवाड़ कर रहा है।जब भीषण गर्मी होती है और सांस लेने में परेशानी होती है तब ऐसे में अपने घर के बाहर खडे उस वृक्ष का ही सहारा मिलता है-वह गर्मी में शीतलता देता है। हमारे घर के बाहर एक सरकारी विभाग ने दो पेड़ लगाए थे। एक को पशु खा गए थे दूसरे को बचाने के लिए चारों तरफ बबूल के ढेर लगा दिए। वह बच गया और आज उसका जो सहारा है वह हमें पता है। कई लोगों ने पेड़ों की जमीन पर पक्के चबूतरे बनवा लिए हैं और अब वह इस पर्यावरण के प्रदूषित होने के लिए दूसरों पर जिम्मेदारियां थोपते नजर आते हैं। उनकी बातें मजाक लगतीं हैं। अक्सर सोचता हूँ कि अब होली पर मजाक लिखने की क्या जरूरत है लोग तो साल भर ऐसा सुख प्रदान करते हैं।

पिछले कई वर्षों से बरसात प्रयाप्त नहीं हो रही और पेड़ों और पशुओं के स्थानों पर आदमी कब्जा करने में लगा है। हाय-हाय सब मचाये हुए हैं।जो प्राणवायु(ऑक्सीजन) और जल हमारे जीवन का आधार है उसकी कोई चिंता नहीं करता। एक परिचित सज्जन से मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा था तो उनके साथ खडे दूसरे सज्जन बोले-”हमारे गुरु कहते हैं कि अधिक चिंता न करो। नहीं हो रही बरसात तो न हो। पेड़ काटने से ऑक्सीजन कम हो रही है, पानी का जल स्तर कम हो रहा है, इनकी चिंता करने आदमी और अधिक बीमार होता है। हम तो पहले ही बीमारियों से परेशान है और अगर इस बात की फिक्र करेंगे तो और बीमारी बढ़ जायेगी।”
मैं उन सज्जन से परिचित नहीं था इसलिए हंस दिया पर मेरे परिचित सज्जन ने उससे कहा–’तुम्हारे गुरु ने तुम्हें यह नहीं बताया कि अपने घर के बाहर खडे पेड़ को कटवाकर बीडी-सिगरेट बेचने वालों की दूकान मत लगवाओ। यह नहीं बताया कि पेड़ों में देवताओं का वास होता है। कौनसे गुरु हैं तुम्हारे जो तुम्हें कहते हैं कि भविष्य की चिंता मत करो। तुम्हें दीपक की बात कड़वी लग रही हैं क्योंकि इसकी बात में कोई सच है जो तुम्हारी पोल खोल रहा है। मुझे तो बहुत आनंद आ रहा है।”
फिर तो वह दोनों विवाद करने लगे और मैं अपने परिचित सज्जन से विदा लेकर चला आया। यह एक वास्तविकता है कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए सब दोषी हैं और इसलिए सब इससे कतराते हैं। पर्यावरण का मामला मेरी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है और इस होली पर इसी पर ही अधिक विचार होना चाहिए। सब कहते हैं कि मौत तो सबको एक दिन आनी है पर मौत से पहले ही शरीर का खराब स्वास्थ्य आदमी को इतना लाचार बना देता है कि उसका जीवन नरक हो जाता है। लोग अपने मन और शरीर की विकारों को साथ लिए हुए फिर रहे हैं और दूसरों को त्रास देने वाली बातें क्यों करते हैं. यह सोचने का विषय है।होली के रंग अब बिलकुल फीके हो चुके हैं और जो एक-दूसरे पर डाल रहे हैं उनके मन भी बेरंग हैं। लोग दिखाने के लिए यह पर्व माना रहे हैं पर उनके दिल कितने खुश है? किसी दूसरे पर दृष्टिपात करने की बजाय यह आत्ममंथन का विषय है।

3 Responses to “होली के रंग फीके, मन है बेरंग-पर्यावरण पर चिंतन”

  1. दीपक जी होली की शुभकामनायें..

  2. आप को होली की बहुत-बहुत बधाई।

  3. आपको होली बहुत-बहुत मुबारक.

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