वही कहलाता है असली सम्मान-हास्य कविता

अपने सीने में दर्द छिपाये हर समय
इधर-उधर ढूँढता है खुशी हमेशा इंसान
कही जश्न के लिए पीता है शराब
ताकत के लिए खाता कबाब
ढेर सारे पैसे से बनता नवाब
पर अकेले में होता है
अपने कर्मों से ही होता परेशान

इन्तजार करता है त्योहारों का
कुछ मिलने के व्यवहारों का
जिंदा रहने के लिए ढूँढता है सम्मान
मुर्दा दिलों में कहलाता है महान
सिद्धि के लिए करता है यत्न
प्रसिद्धि के मनाता है जश्न
अपने से भागता रहता है इंसान

सीख लो हर पल जीना
सत्कर्मों को नशे की तरह पीना
कुछ मिलने से मजा अधिक देर नहीं आता
देने से किसी को नाम आगे जाता
गले में हार पड़ने से
पीठ पर चाल डालने से
मिलता है थोडी देर का सम्मान
अपने बोलों में भर दो रस
अपने जिए पलों का बांटो ज्ञान
रचनाओं में भाव भरो शब्दों को कस
पाने वाले हाथों को कौन पूजता है
देने वाला ही खुशी भी लूटता है
जीते जी और सामने तो सब पूजते हैं
मरने या पीठ पीछे हो
वही कहलाता है असली सम्मान
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