चाणक्य नीति:सभी वनों में चन्दन वृक्ष नहीं होते
पर्वत तो बहुत हो सकते हैं किन्तु यह आवश्यक होना कदापि नहीं हो सकता कि प्रत्येक पर्वत पर माणिक्य उपलब्ध ही हों। जैसे कि प्रत्येक हाथी के मस्तक में गजमुक्ता होना जरूरी नहीं है उसी प्रकार सभी वनों में चन्दन वृक्ष हों यह आशा भी नहीं की जा सकती है।
वर्त्तमान संदर्भ में व्याख्या-सभी तिलों में तेल नहीं होता और सब धनी दयालू हों यह भी जरूरी नहीं है। आजकल आकर्षण और चमक का ज़माना है। अगर देखें तो पिछले कुछ समय से हमारे देश में भौतिक साधनों की उपलब्धता बढ़ी है, कहने को तो यह भी कहा जाता है कि हमारा राष्ट्र विकास के पथ पर है पर यह चमक एक दिखावा है। इस विकास के साथ हमारे साँस्कृतिक मूल्य बिखर रहे हैं। देश में धनपतियों की संख्या बड़ी है पर उस संख्या से अधिक गरीब बढ़ें हैं। समाज में पूंजीपतियों की एक भूमिका होती थी और उससे सद्भाव और संतुलन बना रहता था पर आज वह समाप्त हो गया है। धनवानों से हमेशा दया और समाज की आर्थिक रक्षा की अपेक्षा की जाती है। इसके विपरीत हम हर रोज अपने देश के शक्तिशाली लोगों द्वारा कमजोर वर्ग के साथ अनाचार और शोषण की खबरें पढ़ते हैं।
अक्सर कुछ लोगों को ग़लतफ़हमी होती है कि जो धनी है उसके सेवा कर या उसे प्रसन्न कर कुछ धन प्राप्त किया जा सकता है उन्हें चाणक्य के उक्त कथन से प्रेरणा लेनी चाहिए। सभी धनाढ्य, उच्च पदारूढ़ और प्रतिष्ठत लोगों में दया और समाज सेवा की भावना हो यह जरूरी नहीं है। इसलिए सोच समझकर अपना कदम आग बढाने चाहिए।
आजकल हम लोग ऊंची-ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों के बारे में भ्रम पाल लेते हैं कि उनमें सभी सभ्य लोग रहते हैं या जिनके पास बहुत दौलत हैं तो वह दयालू हैं तो उसे दूर कर लेना चाहिए. समाज में जो कथित बडे लोग हैं उनका आचरण भी ऊंचा होगा यह नहीं सोचना चाहिए . माया की महिमा ऐसी है कि वह किसी भी आदमी को बड़ा बना देती है पर वह किसी के बौने चरित्र को ऊंचा नहीं कर सकती
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