चाणक्य नीति:अस्थिर चित्त वाले व्यक्ति में सदभावना नहीं रहती
१.अर्थ कार्यों का मूल होता है
राज्यश्री ही राज्यशक्ति के कर्मों का मूल आधार होती है. लौकिक काम तो धन-धान्य से संपन्न होते हैं,जैसे पर्वत से नदियाँ निकलकर बहने लगतीं हैं इसी प्रकार प्रवाहमान धन से समस्त काम होता है. जिस तरह रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है वही धन का भी होता है. इसलिए धन का प्रवाह कभी रोकना नहीं चाहिऐ और उसका व्यय भी करते रहना चाहिए
२.अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के पास सदभावना की वृति नहीं होती.
अव्यवस्थित चित्त वाले पुरुष के मन में उथल-पुथल अधिक होती है और मानसिक अस्थिरता के कारण अच्छी वृतियां सक्रिय नहीं होतीं. भाग्य के भरोसे रहने वाला मनुष्य जीवन के भौतिक साधनों का संग्रह करने से वंचित हो जाता है.
३.दान में शूरता दिखाने वाले ही सच्चे वीर होते हैं.
अपने पास जो संपति है उसमें से सुपात्र को दान देने वाले व्यक्ति ही वास्तविक वीर है.
आज के संदर्भ में व्याख्या- सच तो यह है कि हमारे पास संपत्ति या धन है वह किसी के पास जाना ही है. हम जो धन कमाते हैं उसे किसी न किसे रूप में कहीं खर्च अवश्य करते हैं, इस तरह जो धन है वह किसी की धरोहर होती है जो हम किसी को सौप्नते हैं. उसी तरह जो अचल संपतियाँ होती हैं वह भी हमारे बाद किसी न किसी को हस्तांरित होती हैं. आदमी अपने जीवन काल में धन और संपति को अपने सीने से चिपका कर रखना चाहता है, पर जो अपनी धन और संपति को किसी की धरोहर मानकर अपने जीवनकाल में ही सुपात्र को दान देता है उसे वीर ही कहा जाता है.
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dhan wali baat bahut achhi lagi,sahi