चाणक्य नीति-जरूरत हो तो दिखावा भी करें
सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह अपना फन फैला देता है, जिससे अन्य जीव डरकर पीछे हट जाते हैं। अगर वह ऐसा न करे तो कोई भी उसे मार डालेगा। इसलिए अपने आप को शक्तिशाली प्रदर्शित करना भी जरूरी है।
आज के संदर्भों में व्याख्या-चाणक्य के इस कथन का आशय यह है की हमें सांसरिक जीवन में कई बार दिखावे की आवश्यकता होती है क्योंकि यहाँ लोगों में देवत्व और राक्षसत्व दोनों का ही भाव होता है। हमारे साथ अच्छे और बुरे लोगों का संपर्क होता है पर किसके दिल में क्या है यह पता नहीं लगता। ऐसे में थोडी चतुराई जरूरी है। हमें अपनी कमजोरी किसी को नहीं बताना चाहिए और और अनावश्यक रूप से अधिक विनम्रता का भाव दिखाने से लोग कमजोर समझने लगते हैं। कभी किसी से वाद-विवाद हो तो अपने क्रोध और विवेक शक्ति का पूरा उपयोग करना चाहिए और ऐसा प्रदर्शित करना चाहिए कि हम शक्तिशाली हैं।
धन दौलत तो किस्मत का खेल है पर अगर जरूरी न हो तो अपनी आर्थिक तंगी का जिक्र सबके सामने नहीं करना चाहिऐ। कई बार तो ऐसे दिखाना चाहिए कि हमारे पास भी पर्याप्त मात्रा में धन है। समाज में धनवान का सम्मान होता है पर गरीब को समाज कुछ देता भी नहीं है। अगर पर्याप्त मात्रा में धन नहीं है तो परिवार और उसका मुखिया ही उसका सामना करता है। अगर अनावश्यक रूप से दूसरों के सामने अपनी दरिद्रता का प्रदर्शन करेंगे तो अपना और अपने परिवार का सम्मान समाज में काम होगा। इसका अर्थ यह भी कदापि नहीं है कि इस दिखावे के लिए हम अनाप-शनाप खर्च करें। अगर कोई दिखावे की वस्तु हम नहीं खरीद सकते तो हमें उसके प्रति लोगों के सामने नापसंदगी का भाव दिखाना चाहिऐ- भले ही यह उसी तरह हो जैसे लोमडी अंगूर न मिलने पर कहती हैं कि खट्टे हैं। ऐसे दिखावे करना जरूरी हैं पर इसमें अनावश्यक प्रदर्शन से बचना चाहिए।
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सही सीख
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