संत कबीर वाणी:कुल के अंहकार का भाव भक्ति में बाधक
कुल खोये कुल उबरै, कुल राखै कुल जाय
राम निकुल कुल भेटिया, सब कुल गया बिलाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुल के अंहकार को मिटाकर सेवा करने पर संपूर्ण रूप से अपना कल्याण होता है और कुल का अंहकार रखने से संपूर्ण हित नष्ट हो जाते हैं. जब अपने मन में केवल भगवान् के प्रति सच्चा भाव होता है तब कुल आदि का भाव नहीं रह जाता है.
कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय
तब कुल काको लाजि है, चारि पाँव का होय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं मनुष्य कुल के मोह में पड़कर पतित भाव को प्राप्त हो जाता है. वैसे मनुष्य हंस का स्वरूप है परन्तु उसे भूलकर वह सांसरिक बातों के चक्कर में पड़ जाता है. कुल की मर्यादा की लाज का ख्याल करते हुए वह दुनिया का बोझ इस तरह उठाता है जैसे चार पाँव वाला जीव हो.
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