इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते-कविता साहित्य

इंसानों की भीड़ में
कभी दर्द. कभी प्रेम
और हास्य से सुसज्जित
शब्दों से रचनाएं बरसाने वाले
कवि अकेले क्यों हो जाते
शायद इसलिए कि पुराने भ्रमों में
चलते हुए लोगों को
वह कभी रास नहीं आते
समाज के लिए हमेशा जूझते
पर यकीन नहीं जीत पाते
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते

भ्रम के निवारण की कोशिश
अपराध क्यों माना जाता
शायद इससे स्वर्ग का टिकट
बेचने वालों का धधा मारा जाता
और उनकी ताकत पर चलता
सारा यह गुलाम ज़माना
जिसे हैं सर्वशक्तिमान की दुआ कमाना
कवि का शब्द
जिन्दगी के सच से उपजा
भ्रम का शत्रु हो जाता
भेड़ की तरह भेड़ियों के पीछे जाते लोग
अपने अगुआ के कथन से
अपने को आजाद करने से घबडाते
बनाते सच्चे शब्दों से दूरियां
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते

कोई कवि नहीं बेचता
सर्वशक्तिमान के घर पहुंचाने का दावा
स्वर्ग में सुरक्षित पहुंचाने का छलावा
सुनकर कविता लोग खुश हो जाते
जमकर तालियाँ बजाते
पर फिर भ्रम के रास्ते जाते
फिर पुराने किताबों में लिखे
संदेशों को सुनाने वाले
अपने ही आकाओं के जाल में फंस जाते
तब कवि के सच्चे शब्द ही
सबसे बड़ा भ्रम नजर आते
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते

फिर भी भाषा रचती है
अपने लिए कुछ शब्दवीर
जो अपने शब्दों से भले ही
जमाने की बदल नहीं पाते तस्वीर
पर सच के साथ ही चलते
भले ही कैसी भी हो तकदीर
अस्तित्वहीन भ्रम भले ही
बढ़ता लगता
पर कवि के शब्दों के आईने में
उनका असली चेहरा दिखता
डरते हैं लोग जीवन के सच से
इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते
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One Response to “इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते-कविता साहित्य”

  1. हमें अकेले ही चलना है बन्धुवर……

    बस लिखते चलें…

    कुछ के लिए बेकार हैँ हम…
    कुछ के लिए हमारा लिखना पागलपन के सिवा कुछ नहीं हैँ। कुछ के लिए हमारा लिखा टाईम पास करने का साधन मात्र है।

    कुछ ने हमें सिरे से नकार दिया है और …

    कुछ ने बस पढना है और पढकर भूल जाना है…..

    हमें बस अकेले ही चलना है……

    अकेले ही चलना है…

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