एक बेकार खबर को खींचने की कोशिश-आलेख

कल आस्ट्रेलिया के हावर्ड में श्री लंका के स्पिनर मुरलीधरन की टांग में किसी लड़के द्वारा अंडे मारने की घटना हुई थी. यह खबर भारतीय टीवी चैनलों द्वारा दिखाई गयी थी. इसमें एक चैनल के संवाददाता जो ब्रिस्बेन थी उसने अपने चैनल को जो जानकारी दी उसके अनुसार कुछ लड़के आपस में एक दूसरे को अंडे मार रहे थे उसमें से एक मुरली की टांग में लगा और यह एक मामूली बात थी.

इसी संवाददाता के कथानुसार उसने मुरली से बात की थी और उसने बताया कि यह कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर कुछ कहा जाये. शुरू में वह चैनल जो इसे नस्लवाद और आस्ट्रेलिया के दर्शकों द्वारा एशियाई खिलाडियों की बदतमीजी के इतिहास से जोड़ रहा था अपनी खबर से पीछे हट गया. इस खबर को सुनने के बाद पहले मेरे को भी लगा के अब यह दूसरा बवाल मचेगा पर उस संवाददाता की जानकारी के बाद इस बात की संभावना ख़त्म हो गयी लगी.

उस चैनल ने फिर इस खबर को आगे नहीं बढाया, पर दूसरे समाचार चैनल इसे रात तक सुनाते रहे. नस्लवाद के साथ अन्य तमाम तरह की विवेचना करते रहे. तब मुझे हैरानी हो रही थी कि क्या वह एक दूसरे पर नजर नहीं रखते कि हो सकता है कुछ वहाँ से भी मिल जाये-ऐसे ही आत्म मुग्ध होकर भागे जा रहे हैं. कल की इस घटना से एक बात साफ हो गयी है कि अपने देश में पैसा और प्रतिष्ठा खूब अर्जित कर लें पर उनमें व्यवसायिकता का अभाव है. ऐसा नहीं होता तो यह खबर अन्य चैनल रात तक नहीं घसीटते.

यह व्यवसायिकता का तकाजा है कि अपने प्रतिदंद्वी पर भी नजर रखो और देखो वह किस तरह की रणनीति अपना रहा है. जो खबर भारतीय समयानुसार दोपहर १२ बजे तक अपना महत्त्व खो चुकी थी एक चैनल के अलावा बाकी चैनल रात नो बजे तक ताजा रखने का प्रयास किया यह इस बात का प्रमाण है कि उनमें काम करने वाले लोग अधिक कुशल नहीं है.
आप चाहे किसी क्षेत्र में रहें अपने प्रतिद्वंदियों और मित्रों दोनों पर दृष्टि रखो तभी उसमें आप निरंतर प्रदर्शन करते रह सकते हैं. भले ही हम लोगों को ब्लाग से पैसा नहीं मिल रहा पर फिर भी हमें अपना ब्लोग लिखने के साथ दूसरों का भी पढ़ते रहना चाहिए. अभी तक मेरा आंकलन तो यही कहता है कि वही लेखक बहुत अच्छा लिख रहे हैं जो दूसरों को पढ़ते हैं और उस पर अपनी एक राय कायम करते हैं. जो लोग दूसरों का लिखा हुआ ब्लोग नहीं देखते वह अभी तक इस विधा को पूरी तरह समझ नहीं पाए और इसलिए उनके नैराश्य का भाव उनकी पोस्टों पर भी झलकता है. मुझे तो देखते ही पता लगता है कि कौन ब्लोगर दूसरों को पढता है और कौन नहीं. लिखने के लिए कई ब्लोगों पर भी विषय मिलते हैं और इसके लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नही. ब्लोग पर भी कई लोग बाहर से लिए गए विषयों पर लिखते हैं और यहाँ उनको पढ़ने का मतलब यह है कि आपको बाहर उसके जाने के लिए जरूरत नहीं है.

बहरहाल चाहे कोई भी काम क्यों न करें उसमें अपने कार्य को लेकर आत्ममुग्ध नहीं होना चाहिए के हम ही श्रेष्ठ हैं और न ही अपने ह्रदय में कुंठा पालना चाहिए कि हम ऐसा नहीं कर सकते. दोनों स्थितियों में हम न कुछ नया सीख पाते है न कर पाते हैं. भारतीय चैनल पैसा तो खूब कमा रहे हैं पर आज भी बी.बी.सी. और सी.एन.एन. का मुकाबला नहीं कर पाते क्योंकि उनमें वैसी व्यवसायिकता नहीं है. आखिर नौ घंटे तक ऐसी मुर्दा खबर में प्राण फूँकने की कोशिश करने को किसी भी प्रकार से कार्य कुशलता नहीं कहा जा सकता.

2 Responses to “एक बेकार खबर को खींचने की कोशिश-आलेख”

  1. Wah .
    Kya Khhob in channel waloo ki Khaber li Hai , sach main yeh ek sochne ki Baat Hai ki Ye Channel wale ek Choti se khaber ki Tang Pakad kar lambaa karne me kyo lage rahate hai. or har channel ek dosere ki hi baat katta karta hai.

    main hindi main blog kaise likhuu.

  2. आपकी बात सही है.. किसी भी तरह ये चैनल एक्सक्लूसिव के नाम पे दूसरे चैनल से अपने अलग दिखने के लिये इस तरह की हरकत करते रहते हैं..करें क्या, एक ही न्यूज़ हर चैनल पर टहलता रहता है..

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