कैसे करते हैं वारे-न्यारे-हास्य कविता

आया फंदेबाज फिर घर और बोला
”दीपक बापू यह भी भला क्या
किताबों की नक़ल छापते हो
कभी लिखते किसी के समझ में
न आने वाला चिंतन
और कभी हास्य कविता लिखकर
बस उसे ही झांकते हो
कभी गरीबों पर भी लिखो
भले ही उनका कल्याण मत करो
पर उनके झंडाबरदार बनते दिखो
तभी बनोगे नंबर वन ब्लोगर
अभी तो खाली-पीली हांकते हो’

सुनकर चौंके और फिर कीबोर्ड पर
नाचती उंगलियाँ रोकी
उतारी सिर से टोपी
और चश्में को किया नाक पर
कहैं दीपक बापू
”अभी टीवी पर देखी थी हमने एक खबर
तुम तो होगे उससे भी बेखबर
किया था एक डाक्टर ने
फिर फिल्म में पुलिस वाले का रोल किसी टाईम
करता था इधर गरीबों की किडनी उखाड़कर
अमीरों को लगाने का क्राईम
सब धंधों में हैं उसका नाम
भले आदमी के लिए बचा है कोई काम
इधर गरीबो के कल्याण के लिए नारे लगाते
उधर उसके लिए आती मदद अपनी
जेब में ही कर जाते
क्या उनकी तरह हम भी नारे लगाकर
करें गरीबों का कल्याण
हमारे यहाँ वर्जित हैं बताना किया गया दान
रहा हमारे लिखने का सवाल
उससे भला क्या मचेगा बवाल
गरीबी पर लिखा या फिल्म में रचा
अमीर देशों में अंग्रेजी में ही बिकता
वहाँ नहीं है दर्द इस देश के गरीबों जैसा
इसलिए लिखने वाले कमा लेते
उन पर लिख कर पैसा
हम लिखें क्या जिन्होंने लिया
उनके दर्द को बेचने का ठेका
वह भी हारने लगे है
अमीरों का राज चलेगा
यह वह भी मानने लगे
गरीबों के दर्द पर लिखने से
उनकी गरीबी दूर होती तो हम भी
कई वाद चलकर नारे लगाते
अपने लिए बहुत सारे सामान जुटाते
पर ऐसे में अपने से दूर हो जाते
तुम ने भी खूब सुने हैं वाद और नारे
देखा होगा कैसे करतें हैं लोग
गरीब की जमीन और किडनी छीनकर
अपने वारे-न्यारे
फिर अब इसके लिए हमारे
कीबोर्ड पर क्यों झांकते हो
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One Response to “कैसे करते हैं वारे-न्यारे-हास्य कविता”

  1. अच्छी और सटीक।

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