कुछ न पढा, रौनक है चेहरे पर इसलिए-हास्य कविता

निकले सुबह अपने घर से
धोती-कुर्ता और टोपी पहने
रास्ते में जो भी मिलता यह कहता
”दीपक बापू
क्या बात है आज
आपके चेहरे पर बहुत रौनक है
जल्दी घर से निकले किसलिए”

हैरान होकर
अपनी राह चलते रहे
लोगों की फब्तियाँ सहते रहे
शहर के चौराहे पर पहुंचकर
एक दूकान पर रुक गए चाय पीने के लिए

दीवार पर टंगे कांच के सामने जाकर
अपनी टोपी उतारकर
सिर पर हाथ फेरते हुए
जो अपना चेहरा देखा तो याद आया
‘आज तो घर पर अख़बार नहीं आया
कुछ नहीं पढा
कोई ख्याल नहीं था दिमाग में
चेहरे पर शायद तनाव नहीं आया इसलिए’

घूम-घाम कर घर पहुंचे
तो देखा घर के बाहर चहल-पहल थी
सब बच्चे खेल रहे थे
और महिलाएं हंसी-ठिठोली कर रही थी
सबके चेहरे पर खुशी देखकर
उन्होने पत्नी से पूछा
”क्या बात है वैसे तो सब अन्दर घर में
घुसे रहते हैं
आज यह कैसी चहल-पहल
लोगों के चेहरे पर मस्ती है किसलिए”

पत्नी बोली
कल से डिस्क बंद है
बच्चे और महिलाओं ने
देखा नहीं है कोई सीरियल
सब टेंशन फ्री हैं
उनके चेहरे पर हंसी है इसलिए
जब मार-धाड़ और रोने और चिल्लाने वाले
लोगों को रोज देखेंगे तो
हंसी आयेगी चेहरे पर, कैसे और किसलिए’

कहैं दीपक बापू
कुछ बुरा न पढें, न सुने और न देखें
तो चेहरा खिला होता है
लोग तनाव से मुक्त होते हैं इसलिए’

3 Responses to “कुछ न पढा, रौनक है चेहरे पर इसलिए-हास्य कविता”

  1. बिलकुल सही फरमाया आपने…आधी से ज़्यादा टैंशन तो इन सीरियलों की वजह से है आजकल।

    तुलसी को ज़रा सा जुकाम भी हो जाता तो पता नहीं कितनी औरतों को छींके तक लग जाती थी

  2. भाई वाह !
    क्या खूब लिखा है !!

  3. bahut badhiya,satya,hasi khushiya lati hai,bahut sundar.

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