शायद ही लोग समझ पाएं-कविता

जो हमसे रूठ जाएं
उन्हें हम कैसे समझाएं
पहले खुद को ही तो समझ पाएं
पल-पल बदलता मन
एक पल जो अच्छा लगे
दूसरे पल ही पछ्ताएं
जब लगता है सभी को
हमने पहचान लिया है
अगले पल ही वह अजनबी बन जाएं

इधर-उधर भटकते हुए
किसी की तलाश है
पर रूप हम कभी जान न पाएं
कभी दोस्त बनते हैं लोग
कब वही दुश्मन बन जाएं
प्यार का जो वादा करें
सबले पहले वही साथ छोड़ जाएं

बेहतर है तन्हाई में ही
तलाशे पहले खुद को
फिर निकल का बाहर आयें
अपने मन के हाल को
पहले खुद ही समझ लें
फिर दूसरों को कुछ बताएं
पर सबके हाल हैं ऐसे जैसे
शायद ही लोग समझ पाएं

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