चजई- क्या सब चलेगा पटकथा पर-हास्य व्यंग्य
भारत की क्रिकेट टीम जीत गयी तो भारत के पूरे मीडिया ने उसको हाथ-हाथ उठा लिय और हारने वाली आस्ट्रेलिया की टीम को एक विलेन साबित करने की कोशिश की। ‘मजा चखाया’ ‘रौंदा ‘ और ‘बद्ला लिया’ जैसे शब्दों का प्रयोग सामान्य मौके पर करते हैं पर उनका इस्तेमाल समाचार के रूप में अब बहुत होने लगा है जो कि मुझे लगता है कि ठीक नहीं है।
पर्थ में जो पांच दिवसीय मैच था वह इस श्रंखला का तीसरा टेस्ट मैच था और इससे पहले दोनों मैच भारत हार गया। अगर मान लीजिये दूसरे मैच में सब कुछ ठीक्-ठाक चलता और भारत मैच जीतता तो क्या पूरे विश्व का मीडिया उसे भुना सकता ? नहीं! वैसे भी भारत में क्रिकेट का खेल इतना लोकप्रिय नहीं रहा जितना पहले था। जिस समय लोकप्रिय था तब भी गावों और शहरों के पढे-लिखे लोगों के अलावा इसे कोई और नहीं देखता था पर उनकी संख्या इतनी थी कि वह इसके लिये एक बहुर बडा बाजार बन गया। हो सकता है कुछ पाठक मेरी इस बात से सहमत न हों क्योंकि यह लेख अंतर्जाल पढा जायेगा जो जिसमें अनेक क्रिकेट प्रेमियों में होंगे। यह एक वास्तविकता है और मैं देख रहा हूं। मेरे कई मित्र जो क्रिकेट के दीवाने थे इससे दूर हो गए हैं और रूचि लेते भी हैं तो कोई लगाव अब इस खेल से नहीं है। मैं अन्य लोगों की तरह नहीं हूं जो सोचते हैं के हमारे विचारों से अलग भी कहीं लोग होंगे जो अलग ढंग से सोचते हैं। मेरा विचार यही है कि हर आदमी का मन एक जैसे ही हिलोरें लेता है और जो हम यहां सोच रहे हैं दूसरी जगह पर भी लोग ऐसा ही सोचते हैं। अगर आप कोई अंतरजल पर ब्लोग लिखते हैं तो आप इसे अनुभव कर सकते हैं कि अगर आप मध्य्प्रदेश एक शहर में बैठकर लिखते हैं तो आपसे सहमति जताते हुए कोई कमेन्ट दिल्ली, बिहार या अन्य प्रदेश से समर्थन करता है. इसी तरह लोग जैसे मेरे साथ हैं वैसे ही सब जगह होंगे और मुझे लगता है कि क्रिकेट का अब कोई आकर्षण अधिक नहीं रहा है. मुझे क्रिकेट के बार में अपने आलेखों पर आई कमेंटों से भी यह पता लगता है.
इसलिए ऐसा लगता है कि कहीं कोई पटकथा लिखकर तो क्रिकेट नहीं हो रहा. अगर ऐसा नहीं है तो लगता है कि मीडिया मैदान पर होने वाली घटनाओं से पटकथा गढ़ लेता है और उसे सुनाता है. टीम हारे तो भी देश के लोगों की सहानुभूति पाए और जीते तो वाह-वाही पाए. अपने प्रचार में खिलाडियों को फिल्म के हीरों की तरह पिटवाओ और फिर अगर जीत जाएं तो उन्हें फिल्मी हीरों की तरह प्रस्तुत करो. जब से फिल्म और क्रिकेट का आपस में तालमेल हुआ है तब से ऐसी उठापठक देखकर कोई भी ऐसा सोच सकता है.
इधर कुछ हमारे साथ भी हुआ था. किसी को हिट ब्लोगर दिखाने के प्रयास में हमारे हलके ब्लोग को पिटने के लिए दिखा दिया. हमें पढ़ते होते तो ऐसी गलती नहीं करते. ऐसी फिक्सिंग को हम जानते हैं. आज ही एक कथित निर्णायक का ब्लोग देखा. किसी खबर की कटिंग थी. खबर वाकई दिलचस्प थी, पर उसके साथ कोई विचार होता कि देखो यह भी फिक्सिंग हो सकती है. हम लिख आये कि भाई कुछ लिखा करो. पर लिखे तो तब जब पढें. हमारे विचार पढे होते तो कुछ लिख जरूर पाते. मगर बिना पढे ही नंबर देंगे. बहरहाल हम अब खूब मजा लेंगे. एक नहीं तीन लोग मिल गए हैं यह समझाने के लिए भाई आजकल तो जीवन ही क्रिकेट है. कहीं वह बकनर हैं तो कहीं तुम. पर यार वहाँ लिखने से क्या फायदा. अपना ब्लोग है. पढ़ते तो हैं नहीं. हम ही बताएं कि भाई हमें तो ऐसा लगता है हर चीज आजकल पटकथा लिखकर हो रहा है. अब ब्लोगिंग हो या क्रिकेट.
हमने तो अपने नियम बना लिए हैं कि जब क्रिकेट की टीम जीते तो इंडिया कि और हारे तो बीसीसीआई की. ब्लोगिंग का भी बना लिया है कि हमें जो दस के दस दे हमारा और जो काम दे उसे अपने शब्द प्रहार के निशाने पर ले आओ. जब सब पटकथा लिखकर चल रहे हैं तो भी हम उनसे अधिक माहिर हैं. अधिकतर लोग क्रिकेट देखते हैं समझते हैं नहीं ब्लोगिंग में भी कुछ ऐसा ही है जो निर्णायक बन रहे हैं उनको यह पता ही नहीं कि दीपक भारतदीप कौन चीज है? पढ़ते होते तो समझते. लिखते रहो अब सब पटकथा हम भी लिखेंगे चितकथा-ताकि लोगों का मन जब क्रिकेट से ऊबे तो हमारे लिखे का मजा ले.
Filed under: Blogroll, Deepak bharatdeep, Hindi friends, hasya vyangy, hindi megzine, hindi shabd, hindi thinking, hindi vyangy, web bhasakar, web dunia, web duniya, web jagaran, web nai duniya, अभिव्यक्ति, आलेख, कला, व्यंग्य, समाज, हास्य आलेख, हास्य-व्यंग्य, हिंदी पत्रिका