वह भूत-भूत कर चिल्लाते

इधर जाएँ कि उधर
यह कभी तय नहीं कर पाए
जिस माया को पाने की चाहत है
उसके आदि और अंत को समझ नहीं पाए

चारों और फैली दिखती है रोशनी
पर कभी हाथ से पकड़ नहीं पाए
कहीं इस घर मे मिलेगी
कहीं उस दर पर सजेगी
और कहीं किसी शहर में दिखेगी
उसके पीछे दौडे जाते लोग
जितना उसके पास जाओ
वह उतनी दूर नजर आये
सौ से हजार
हजार से लाख
लाख से करोड़
गिनते-गिनते मन की भूख बढती जाये

कहै दीपक बापू
माया की जगह जेब में ही है
उसे सिर मत चढ़ाओ
इधर-उधर देख क्यों चकराये
पीछे जाओगे तो आगे भागेगी
बेपरवाह होकर अपनी राह चलोगे
तो पीछे-पीछे आयेगी
जितना खेलोगे उससे
उतना ही इतरायेगी
मुहँ फेरोगे तो खुद चली आयेगी
आदमी के पास जाना उसका है धर्म
करते रहो समर्पण भाव से अपना कर्म
सत्य का यही है मर्म
जीवन के खेल में वही विजेता होते
जो सत्य के साथ ही चल पाए
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वह भूत-भूत कर चिल्लाते
तंत्र-मन्त्र कर भगाने का
नाटक करते नजर आते
बीमारी चिंताओं से बढ़े
वह हवाओं की बताते
हरकते करे दीवानों जैसी
असर शैतानों का जताते

विश्वास की कमी अविश्वास करती पैदा
फसल काटने के लिए सभी जगह
सर्वशक्तिमान की कृपा का दावा
करने वाले दलालों के ठिकाने मिल जाते
अशिक्षितों का क्या
शिक्षित भी उनके यहाँ हाजरी लगाते
मरीज कहाँ जाएँ बिचारे
डाक्टर तक वहाँ लाईन लगाते ह

कहैं दीपक बापू
वह बैठा अन्दर मुस्कराता
जिसे इधर-उधर ढूँढने जाते
उसकी कृपा वह क्या दिलाएंगे
जो उसके नाम पर रोटियाँ सेंके जाते
एक हाथ उठाएं दुआ के लिए
दूसरे से पैसा लिए जाते

बहुत सारे मन्त्र हैं
खुद ही जप कर
अपनी दवा खुद ही कर लो
भला जादू के मन्त्र से कभी
विश्वास और प्यार जीते जाते
नाम कोई भी हो उसे पुकारो दिल से
तभी उसके अपने पास होने की
सहज अनुभूति पाते है
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One Response to “वह भूत-भूत कर चिल्लाते”

  1. जीवन के खेल में वही विजेता होते
    जो सत्य के साथ ही चल पाए।

    ये लाईनें अच्छी लगी।

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