ऐसा भी क्या अक्ल पर पर्दा
सब जगह विकास के नारे लग रहे हैं
कहीं विनाश के बदल घुमड़ रहे हैं
आंखों के सामने हैं सब दृश्य
पर सच क्या हैं अभी मंथन कर रहे हैं
ऐसा भी क्या अक्ल पर पर्दा कि
फैसलों के लिए आपस में ही लड़ रहे हैं
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जिन रास्तों पर चलते हुए
कई बरस बीत गये
पता ही नही लगा कि
कैसे उनके रूप बदलते गए
जहाँ कभी छायादार पेड़ हुआ करते थे
वहाँ लहराता है सिगरेट का धुआं
जहाँ रखीं थीं गुम्टियाँ
वहाँ ऊंची इमारतों के
पाँव जमते गए
जहाँ हुआ करता था उद्यान
वहाँ कचरे के ढेर बढ़ते गये
कहते हैं दुनिया में तरक्की हो रही है
सच यह है कि पतन की तरह
हम कदम-दर कदम बढ़ते गए
हवा में लटकी
खातों में अटकी
गरीब से दूर भटकी
दौलत अगर तरक्की का प्रतीक है तो
सोचना होगा कि हम पढे-लिखे हैं कि
किताब पढ़ने वाले अनपढ़ बन गए
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