कबीर के दोहे:जहाँ अपने गुण की क़द्र न हो वहाँ न जाएं

कबीर क्षुधा कूकरी, करत भजन में भंग
वाकूं टुकडा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग

संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि भूख कुतिया के समान है। इसके होते हुए भजन साधना में विध्न-बाधा होती है। अत: इसे शांत करने के लिक समय पर रोटी का टुकडा दे दो फिर संतोष और शांति के साथ ईश्वर की भक्ति और स्मरण कर सकते हो ।

जहाँ न जाको गुन लहै , तहां न ताको ठांव
धोबी बसके क्या करे, दीगम्बर के गाँव

इसका आशय यह है कि जहाँ पर जिसकी योग्यता या गुण का प्रयोग नहीं होता, वहाँ उसका रहना बेकार है। धोबी वहां रहकर क्या करेगा जहां ऐसे लोग रहते हैं जिनके पास पहनने को कपडे नहीं हैं या वह पहनते नहीं है। अत: अपनी संगति और स्वभाव के अनुकूल वातावरण में रहना चाहिए। भावार्थ यह है कि जहां गुण की कद्र न हो वहां नहीं जायें.

4 Responses to “कबीर के दोहे:जहाँ अपने गुण की क़द्र न हो वहाँ न जाएं”

  1. अच्छी शिक्षा….सच्ची शिक्षा

  2. बहुत बढिया व शिक्षाप्रद दोहे प्रेषित किए है।बधाई।

  3. chankya ki aur policy bataiye

  4. vese to mujhe bachpan se hi kabhir ke dohe pasan hai but aaj website par inko pad kar main aur bhi bhut khush hua.

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