चीन ने आख़िर अपनी जनसँख्या नीति बदली
चीन सरकार ने अपने जनसँख्या नीति में बदलाव करते हुए अब शहरी क्षेत्रो में लोगों के ले लिए बच्चों के जन्म की सीमा एक से बढ़ाकर दो करने का निर्णय लिया है-पहले शहरी क्षेत्रों में एक तथा ग्रामीण क्षेत्रों में दो बच्चे पैदा करने की छूट थी। चीन की तथाकथित विकसित तथा शक्तिशाली राष्ट्र की छबि से प्रभावित लोग उसकी जनसँख्या नीति के प्रशंसक रहे हैं, उनके लिए इसमें संदेश है पर वह शायद ही कोई इसे समझ पाए -क्योंकि तानाशाही के तले दबी वहाँ की जनता की आवाज विदेशों कें कभी नहीं पहुंची और वहां की सरकार ने जो प्रचार विश्व भर में कर रखा है उसके प्रतिवाद में कोई तथ्य बाहर निकलना मुश्किल है।
भारत में तो स्थिति और भी ज्यादा विचित्र है। चीन के समर्थक तो ठीक उसके विरोधी भी उसकी प्रगति का लोहा मानते हैं। हालंकि चीन के तथाकथित विकास और शक्तिशाली होने के दावे को कई विशेषज्ञ उंगली उठाते हैं पर उनके पास तथ्य कम अनुमान ज्यादा होते हैं। एक दिलचस्प बात यह है अपने विकास के दावे चीनी खुद कभी नहीं करते नजर आते जितने अन्य देश के लोग करते हैं। चीन में अभी भी जनसँख्या में कोई कमी नहीं आयी है उस पर सरकार के इस बदलाव से यह संकेत तो मिल गया है कि सरकार के समाज की जबरन जनसँख्या रोकने के कुछ ऐसे दुष्परिणाम जरूर हुए हैं जिसकी जानकारी बाहर के देशों को नहीं है।
चीनी रिश्तों के नाम तक भूलने लगे थे
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बहुत समय पहले मैं एक पत्रिका में पढा था कि चीन लोग तो अपनी पुरानी पहचान खोते जा रहे हैं और वहां कई लडकिया ऎसी हैं जो भाई का मतलब भी नही जानती तो कई ऐसे लड़के भी हैं जो बहिन का मतलब भी नहीं जानते। ताऊ-ताई, चाचा-चाची,मामा-मामी, फूफा-फूफी और अन्य रिश्तों का नाम तक भूल चुके हैं। दुनिया भर के गरीबों और मजदूरों को अमीर बनाने के नाम पर वहाँ सांस्कृतिक क्रान्ति करने वाले लोगों ने वहाँ की परानी संस्कृति को नष्ट कर ही कर डाला। धर्म को अफीम बताते हुए उन्होने समूचे चीन में धन -संपति के अंबार लगाने का सामना दिखाकर वहाँ अपना राज्य कायम कर लिया-साथ ही बोलने और कहने की आजादी भी छीन ली।
फिर शुरू हुआ चीन में एक ऐसा दौर कि वहाँ लिखने-पढने की आजादी मांगने वाले को सरेआम मार दिया गया या जेल में सड़ा दिया गया। एक अमेरिकी विशेषज्ञ का कहना है कि चीन एक बंद गुफा की तरह है वहां क्या है कोई नहीं कह सकता-क्योंकि क्षेत्रफल की दृष्टि से अति विशाल चीन में केवल कुछ ही भागों में विदेशियों को जाने के अनुमति है, और सरकार के व्यवस्था ऎसी है कि आप आम आदमी से मिल नहीं पायेंगे और मिलेंगे तो वह इतना सहमा रहता है कि वह अपनी सरकार की भाषा ही बोलता है। इतना ही नहीं बल्कि चीन से बाहर भी आये चीनी अपनी बात कहने से कतराते हैं-क्योंकि उनमें कहीं न कहीं अकेलेपन का बोध होता है जो शायद वहाँ की जनसँख्या नीति का परिणाम भी हो सकता है।
चीन के आर्थिक विकास पर भी कई लोग उंगली उठाते हैं-उनका कहना है कि वहाँ के जो भी आंकडे हैं वह सरकारी है और उनकी प्रमाणिकता संदिग्ध है। सामजिक विशेषज्ञ भी उसके इस बाते को चुनौती देते हैं कि वहां कोई जातिवाद नहीं बचा है-कुछ का कहना है इस तानाशाही में कुछ खास समुदायों के लोगों को अपना वर्चस्व जमाने का अवसर मिल गया और वहां अब भी कहीं कहीं जातीय तनाव की स्थिति बन जाती है। एक बात पर सभी एकमत है कि एक बच्चे की जनसँख्या की नीति ने वहाँ के समाज को खोखला किया ! वजह साफ है कि व्यक्ति से परिवार, परिवार से रिश्तेदार और और रिश्तेदार से समाज के जो बनने का क्रम है उसमे रिश्तेदार की कडी कमजोर हो गयी थी और एशियाई देशों में सबसे सशक्त समाजों वाला चीन अपनी पहचान खो बैठा। उनकी सरकार तो यह मानती है कि आदमी को बस रोटी, कपड़ा और मकान चाहिऐ और वह यह भूल गयी की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके मन में अन्य लोगों से जुड़ने की प्रवृति होती है- यही कारण है आर्थिक रुप से तथाकथित शक्तिशाली राष्ट्र के नागरिकों के चेहरे पर जो हंसी दिखती हैं वह खोखली साबित होने लगी है। वहां के किसी वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, लेखक, अभिनेता, या समाज सेवा में नाम कमाने वाले किसी व्यक्ति का नाम कभी भी चर्चा का विषय नहीं बना। वहाँ के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का नाम ही चर्चा में आता है।
शायद चीन की नयी पीढ़ी में बगावत के कोई ऐसे तत्व मौजूद हैं जिसे अलग दिशा में मोड़ने के यह कदम उठाया गया या वाकई चीन के लोगों की मनोदशा में अपने समाज के कमजोर पड़ने की कोई असहनीय पीडा है जिसे दूर करने के लिए यह कदम उठाया गया है यह तो अलग से अध्ययन का विषय है जो पूरी जानकारी मिलने पर ही चर्चा योग्य होगा।
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